रविवार, 15 नवंबर 2009

स्मृति और स्वप्न

पिता अपनी तमाम असफलताओं को 
बदल लेना चाहते हैं सफलताओं में
अपने पुत्र में

पिता के स्वप्न को ढोता पुत्र
पिता की स्मृति भी तो है
नहीं जानते पिता पितृत्व से ग्रस्त

पिता के स्वप्न को ढोता पुत्र
एक दिन लौट आता है
पिता की स्मृति में पिता बन कर

पिता बन कर लौटा पुत्र अचानक जीने लगेगा
एक दिन अपने पुत्र की स्मृति में
पिता का स्वप्न बन कर

होते हुए होना

जड़ें ठीक से बताती हैं 
होने के बारे में

मूल की महिमा को
छिपाये रहते हैं वृक्ष

दिखने से दूर
होते हुए होना

शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

दरअसल

दरअसल उजाला ओढ़ने को
हम इस कदर उतावले हैं
कि धूप के इरादों की नेकनीयती पर
शुब्हा कर ही नहीं पाते
हर बार चमाचम सूरज की चाह में
हम ग़लत मौसम चुनते हैं
और मार खाते हैं

वे हमारी कमजोरी से वाकिफ़ हैं
और चौगिर्द फैले अँधेरे के खिलाफ़
हमें हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं

उन्हें मालूम है
घुप्प अँधेरी रात में
मशाल दिखा कर ही
पतंगे को बरगलाया जा सकता है
मर मिटने को
दीवाना बनाया जा सकता है

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

शहर और शगल

देखा आपने
उसे लेकर
समूचा शहर किस कदर परेशान है
गोया वह आदमी नहीं आबरू है
जिसकी फ़िक्र हर शख़्स को है

अब आप देखिए
कल तक उन आबदार अंगूरी आँखों में
वह महज घटिया और बेहूदा क़िस्म की
एक फ़िजूल-सी चीज़ था
लेकिन ऐलान होते ही
उन्होंने उसे नाबदान से उठाया
और बेशकीमती गुलदस्ते में सजा कर
ड्राइंग रूम में रख दिया

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

पेड़ की तरह

एक पेड़ की तरह हो
हम सबका जीना
उम्र भर का हरापन
ऋतुओं का प्राणदायी आवर्तन
कुछ रंग कुछ गंध
कुछ फूल-फल
शीतलता जीवन की
और भरपूर समिधाएं

कब आयेगा वह दिन
जब काटे जाने पर भी 
नहीं जागेगी मुझमें 
बदला लेने की इच्छा

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

स्वाभाविक और जरूरी

कुछ लोग मुझे पसंद करेंगे
कुछ नापसंद
यह स्वाभाविक है
और जरूरी भी
दुनिया के सन्तुलन के लिए

लगभग लुच्चापन है यह कोशिश
कि सभी मुझे पसंद करें

दियासलाई

आदमी की ईजादों में
दुर्लभतम् ईजाद है दियासलाई
वह भक् से जलती है उजाले में
और हो जाती है ओझल

आदमी कब सीखेगा जीना
क्षण की त्वरा में