देखा आपने
उसे लेकर
समूचा शहर किस कदर परेशान है
गोया वह आदमी नहीं आबरू है
जिसकी फ़िक्र हर शख़्स को है
अब आप देखिए
कल तक उन आबदार अंगूरी आँखों में
वह महज घटिया और बेहूदा क़िस्म की
एक फ़िजूल-सी चीज़ था
लेकिन ऐलान होते ही
उन्होंने उसे नाबदान से उठाया
और बेशकीमती गुलदस्ते में सजा कर
ड्राइंग रूम में रख दिया
बृहस्पतिवार, 15 अक्तूबर 2009
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बहुत अच्छी कविता है राकेश जी | यह उस वर्गचरित्र को स्पष्ट करती है आम आदमी जिसे अपना आदर्श समझने की भूल कर बैठा है । -शरद कोकास ,दुर्ग छ.ग.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत बेहतर रचना, बधाई.
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