तुम जब हँसती हो तो आ जाती है
धूप में अनोखी चमक
जल में विरल तरलता
हवा में अद्भुत उल्लास
गुलाबों में सिहरन
पेड़ों में हरा उजास
तुम जब हँसती हो तो बढ़ जाती है
नक्षत्रों की कांति
नदियों में विपुल जल
खबरों में अवकाश
बादलों में बारिश
घरों में सुख-चैन
तुम जब हँसती हो तो गाती है
देह में सर्पिलता
लहू में रक्तिम आभा
मन में अनन्त इच्छाएँ
आत्मा में अमरता
अस्थि-मज्जा में जिजीविषा
तुम जब हँसती हो तो भर जाता है
स्त्रियों में लबालब प्यार
पुरूषों में विनम्र अनुरोध
पिता में पुरुषार्थ
माँ में मनुहार
संतति में परिष्कार
तुम जब हँसती हो तो उठती है
मिट्टी से सौंधी गमक
बस्तियों से भोज की गंध
दिनों में मशक्कत और अट्टहास
रातों में स्वप्न और आमंत्रण
धमनियों में उद्दाम वेग
तुम जब हँसती हो तो जागती है
घोड़ों में हिनहिनाहट
दोस्तों में दोस्ती
दुश्मनों में दुश्मनी
पण्डितों में चतुराई
ईश्वर में करूणा
तुम जब हँसती हो तो ढँक जाती है
नग्नता आवरण से
आवरण निर्वस्त्रता से
होठ चुम्बनों से
आकाश ग्रह नक्षत्रों से
धरती धन-धान्य से
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गुरुवार, 16 दिसंबर 2010
शनिवार, 31 अक्टूबर 2009
दरअसल
दरअसल उजाला ओढ़ने को
हम इस कदर उतावले हैं
कि धूप के इरादों की नेकनीयती पर
शुब्हा कर ही नहीं पाते
हर बार चमाचम सूरज की चाह में
हम ग़लत मौसम चुनते हैं
और मार खाते हैं
वे हमारी कमजोरी से वाकिफ़ हैं
और चौगिर्द फैले अँधेरे के खिलाफ़
हमें हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं
उन्हें मालूम है
घुप्प अँधेरी रात में
मशाल दिखा कर ही
पतंगे को बरगलाया जा सकता है
मर मिटने को
दीवाना बनाया जा सकता है
हम इस कदर उतावले हैं
कि धूप के इरादों की नेकनीयती पर
शुब्हा कर ही नहीं पाते
हर बार चमाचम सूरज की चाह में
हम ग़लत मौसम चुनते हैं
और मार खाते हैं
वे हमारी कमजोरी से वाकिफ़ हैं
और चौगिर्द फैले अँधेरे के खिलाफ़
हमें हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं
उन्हें मालूम है
घुप्प अँधेरी रात में
मशाल दिखा कर ही
पतंगे को बरगलाया जा सकता है
मर मिटने को
दीवाना बनाया जा सकता है
सोमवार, 22 जून 2009
प्रेम में
प्रेम करते पुरुष के लहू में
चीखते हैं भेड़िये
उग आती हैं दाढ़ें
पंजे और नाखून
प्यार में पुरुष बेतरह गुर्राता है
हाँफता है काँपता है
और शिथिल हो जाता है
प्रेम करने की कला
केवल स्त्री जानती है
वह बेसुध भीगती है
प्रेम की बारिश में
फिर कीलित कर देती है उस क्षण को
देखी है कभी ग्लेशियर से फूटती
पीन उज्ज्वल जल-धार
एक स्त्री ही गुदवा सकती है
अपने वक्षस्थल पर
अपने प्रेमी का नाम
नीले हरफ़ों में
चीखते हैं भेड़िये
उग आती हैं दाढ़ें
पंजे और नाखून
प्यार में पुरुष बेतरह गुर्राता है
हाँफता है काँपता है
और शिथिल हो जाता है
प्रेम करने की कला
केवल स्त्री जानती है
वह बेसुध भीगती है
प्रेम की बारिश में
फिर कीलित कर देती है उस क्षण को
देखी है कभी ग्लेशियर से फूटती
पीन उज्ज्वल जल-धार
एक स्त्री ही गुदवा सकती है
अपने वक्षस्थल पर
अपने प्रेमी का नाम
नीले हरफ़ों में
गुरुवार, 9 अप्रैल 2009
जीवन का जादू
साँसो ने जल से जाना
जीवन का जादू
‘जायते इति’
‘लीयते इति’
आती हुई साँस सृष्टि है
जाती हुई प्रलय
शिव ने पार्वती से कहा
तू इनके मध्य ठहर जा
अमृत को उपलब्ध हो जाएगी।
जीवन का जादू
‘जायते इति’
‘लीयते इति’
आती हुई साँस सृष्टि है
जाती हुई प्रलय
शिव ने पार्वती से कहा
तू इनके मध्य ठहर जा
अमृत को उपलब्ध हो जाएगी।
लेबल:
Jeevan Ka Jadoo. 2009,
Kavita,
Poem
घर
उजाड़–बियाबान में बनाया मैंने
एक माटी का घर
घरों से घिरी दुनिया
कुछ और भरी–पूरी हुई
अगले दिन मैंने पूछी
रहमत चाचा की खैर–कुशल
सुदूर पड़ौस तक फैला
मेरा घर–द्वार
मैं जब–जब सोचता हूँ
तमाम चीज़ों तमाम लोगों के बारे में
तो गाँव, जिला, प्रान्त और राष्ट्र की सीमा में ही
सिमट कर नहीं रह जाता घर–संसार
मैं रोज प्रार्थना करता हूँ
‘हे पिता विश्व का कल्याण करो
सभी को आरोग्य दो! अभय दो! सन्मति दो!’
मेरी दिली ख्वाहिश है
कि अगली बार मैं चीखूँ
आकाशगंगा के सीमान्त पे
ताकि गैलेक्सियों के आर–पार बिखर जाएं
घरों की सरहदें
एक माटी का घर
घरों से घिरी दुनिया
कुछ और भरी–पूरी हुई
अगले दिन मैंने पूछी
रहमत चाचा की खैर–कुशल
सुदूर पड़ौस तक फैला
मेरा घर–द्वार
मैं जब–जब सोचता हूँ
तमाम चीज़ों तमाम लोगों के बारे में
तो गाँव, जिला, प्रान्त और राष्ट्र की सीमा में ही
सिमट कर नहीं रह जाता घर–संसार
मैं रोज प्रार्थना करता हूँ
‘हे पिता विश्व का कल्याण करो
सभी को आरोग्य दो! अभय दो! सन्मति दो!’
मेरी दिली ख्वाहिश है
कि अगली बार मैं चीखूँ
आकाशगंगा के सीमान्त पे
ताकि गैलेक्सियों के आर–पार बिखर जाएं
घरों की सरहदें
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