सीढ़ियाँ नापना चाहती हैं चोटी के रहस्य
तहखानों की गहराई
वैसे उनका ताल्लुक शिखर से अधिक है
रपट कर भी जा सकता है आदमी पाताल में
वे जुड़ी रहना चाहती हैं उस बच्चे से
जिसे फिक्र है बढ़ने-बडरने की
उनकी स्मृतियों में संचित हैं
चढ़ने-उतरने के तमाम नक्शे
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हमेशा लगता है
कि हमें कहीं पहुँचना है
कैसा लगता है सीढ़ियाँ उतरते हुए
झाँक कर देखें गहरी घाटी में
चढ़ने उतरने के सिलसिले के बीच
सीढ़ियाँ ठहरी हैं शताब्दियों से
उनकी ख्वाहिश है वे उड़ कर चली जाएं
सातवें आसमान से परे
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शनिवार, 27 मार्च 2010
रविवार, 15 नवंबर 2009
होते हुए होना
जड़ें ठीक से बताती हैं
होने के बारे में
मूल की महिमा को
छिपाये रहते हैं वृक्ष
दिखने से दूर
होते हुए होना
होने के बारे में
मूल की महिमा को
छिपाये रहते हैं वृक्ष
दिखने से दूर
होते हुए होना
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009
पेड़ की तरह
एक पेड़ की तरह हो
हम सबका जीना
उम्र भर का हरापन
ऋतुओं का प्राणदायी आवर्तन
कुछ रंग कुछ गंध
कुछ फूल-फल
शीतलता जीवन की
और भरपूर समिधाएं
कब आयेगा वह दिन
जब काटे जाने पर भी
नहीं जागेगी मुझमें
बदला लेने की इच्छा
हम सबका जीना
उम्र भर का हरापन
ऋतुओं का प्राणदायी आवर्तन
कुछ रंग कुछ गंध
कुछ फूल-फल
शीतलता जीवन की
और भरपूर समिधाएं
कब आयेगा वह दिन
जब काटे जाने पर भी
नहीं जागेगी मुझमें
बदला लेने की इच्छा
मंगलवार, 22 सितंबर 2009
स्वाभाविक और जरूरी
कुछ लोग मुझे पसंद करेंगे
कुछ नापसंद
यह स्वाभाविक है
और जरूरी भी
दुनिया के सन्तुलन के लिए
लगभग लुच्चापन है यह कोशिश
कि सभी मुझे पसंद करें
कुछ नापसंद
यह स्वाभाविक है
और जरूरी भी
दुनिया के सन्तुलन के लिए
लगभग लुच्चापन है यह कोशिश
कि सभी मुझे पसंद करें
दियासलाई
आदमी की ईजादों में
दुर्लभतम् ईजाद है दियासलाई
वह भक् से जलती है उजाले में
और हो जाती है ओझल
आदमी कब सीखेगा जीना
क्षण की त्वरा में
गुरुवार, 30 अप्रैल 2009
अभिलाषा
‘जन का, जन के द्वारा,
और जन के लिए’
चमकता है संसद की दीवार पे लिखा
लिंकन का प्रसिद्ध सूत्रवाक्य
गण और तंत्र की गरिमा से दीप्त
मेरी अभिलाषा है
इसका मर्म बिंधे मेरे राष्ट्र के प्राणों में
गणतंत्र की गुनगुनी धूप में
और जन के लिए’
चमकता है संसद की दीवार पे लिखा
लिंकन का प्रसिद्ध सूत्रवाक्य
गण और तंत्र की गरिमा से दीप्त
मेरी अभिलाषा है
इसका मर्म बिंधे मेरे राष्ट्र के प्राणों में
गणतंत्र की गुनगुनी धूप में
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गुरुवार, 9 अप्रैल 2009
घर
उजाड़–बियाबान में बनाया मैंने
एक माटी का घर
घरों से घिरी दुनिया
कुछ और भरी–पूरी हुई
अगले दिन मैंने पूछी
रहमत चाचा की खैर–कुशल
सुदूर पड़ौस तक फैला
मेरा घर–द्वार
मैं जब–जब सोचता हूँ
तमाम चीज़ों तमाम लोगों के बारे में
तो गाँव, जिला, प्रान्त और राष्ट्र की सीमा में ही
सिमट कर नहीं रह जाता घर–संसार
मैं रोज प्रार्थना करता हूँ
‘हे पिता विश्व का कल्याण करो
सभी को आरोग्य दो! अभय दो! सन्मति दो!’
मेरी दिली ख्वाहिश है
कि अगली बार मैं चीखूँ
आकाशगंगा के सीमान्त पे
ताकि गैलेक्सियों के आर–पार बिखर जाएं
घरों की सरहदें
एक माटी का घर
घरों से घिरी दुनिया
कुछ और भरी–पूरी हुई
अगले दिन मैंने पूछी
रहमत चाचा की खैर–कुशल
सुदूर पड़ौस तक फैला
मेरा घर–द्वार
मैं जब–जब सोचता हूँ
तमाम चीज़ों तमाम लोगों के बारे में
तो गाँव, जिला, प्रान्त और राष्ट्र की सीमा में ही
सिमट कर नहीं रह जाता घर–संसार
मैं रोज प्रार्थना करता हूँ
‘हे पिता विश्व का कल्याण करो
सभी को आरोग्य दो! अभय दो! सन्मति दो!’
मेरी दिली ख्वाहिश है
कि अगली बार मैं चीखूँ
आकाशगंगा के सीमान्त पे
ताकि गैलेक्सियों के आर–पार बिखर जाएं
घरों की सरहदें
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