कुछ लोग नापना चाहते हैं
आकाश की अन्तिम ऊँचाई
वे छलाँग लगाते हैं ब्रह्माण्ड में
और लौट आते हैं धरती पर निरुपाय
गुरुत्वाकर्षण का नियम उनके आड़े आता है
कितना उचित है उनका यह सोचना
कि आदमी कहाँ पहुँच गया होता
यदि नहीं होता गुरुत्व का अवरोध
ऊँचाई हो या नीचाई
अस्तित्व का मूलाधार है गुरुत्व ही
अनंत ब्रह्माण्ड में
हम बिखर जाते छिछड़ों की तरह
यदि नहीं होती गुरुत्व की कशिश
हर ऊँचाई के लिए
द़न करनी होती है नींव में
अपनी सबसे बड़ी ख़्वाहिश
वह जो दिख रहा है
शिखर लाँघता हुआ
कब से द़न था अतल में
कौन जानता है
सन्त-जन कहते आये हैं
केवल गुरू ही दिलाता है
भव सागर से मुक्ति
कबीर ने यूं ही नहीं किया
गोविन्द से पहले उसका पा-लागन
ब्रह्माण्ड की यात्रा शुरू करने से पहले
मैं पूरी करता हूँ अपनी प्रार्थना
...स्वस्ति नो बृहस्पतिर्ददातु!’
मंगलवार, 16 फरवरी 2010
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