शनिवार, 27 मार्च 2010

सीढ़ियाँ

सीढ़ियाँ नापना चाहती हैं चोटी के रहस्य
तहखानों की गहराई
वैसे उनका ताल्लुक शिखर से अधिक है
रपट कर भी जा सकता है आदमी पाताल में

वे जुड़ी रहना चाहती हैं उस बच्चे से
जिसे फिक्र है बढ़ने-बडरने की
उनकी स्मृतियों में संचित हैं
चढ़ने-उतरने के तमाम नक्शे

सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हमेशा लगता है
कि हमें कहीं पहुँचना है
कैसा लगता है सीढ़ियाँ उतरते हुए
झाँक कर देखें गहरी घाटी में

चढ़ने उतरने के सिलसिले के बीच
सीढ़ियाँ ठहरी हैं शताब्दियों से
उनकी ख्वाहिश है वे उड़ कर चली जाएं
सातवें आसमान से परे

चैत और चिड़िया

चैत और चिड़िया
मुझे बताते हैं
सुलगती धूप और
प्रजनन की ज़रूरतों के बारे में

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

गुरुत्वाकर्षण

कुछ लोग नापना चाहते हैं
आकाश की अन्तिम ऊँचाई
वे छलाँग लगाते हैं ब्रह्माण्ड में
और लौट आते हैं धरती पर निरुपाय
गुरुत्वाकर्षण का नियम उनके आड़े आता है

कितना उचित है उनका यह सोचना
कि आदमी कहाँ पहुँच गया होता
यदि नहीं होता गुरुत्व का अवरोध

ऊँचाई हो या नीचाई
अस्तित्व का मूलाधार है गुरुत्व ही
अनंत ब्रह्माण्ड में
हम बिखर जाते छिछड़ों की तरह
यदि नहीं होती गुरुत्व की कशिश

हर ऊँचाई के लिए
द़न करनी होती है नींव में
अपनी सबसे बड़ी ख़्वाहिश
वह जो दिख रहा है
शिखर लाँघता हुआ
कब से द़न था अतल में
कौन जानता है

सन्त-जन कहते आये हैं
केवल गुरू ही दिलाता है
भव सागर से मुक्ति
कबीर ने यूं ही नहीं किया
गोविन्द से पहले उसका पा-लागन

ब्रह्माण्ड की यात्रा शुरू करने से पहले
मैं पूरी करता हूँ अपनी प्रार्थना
...स्वस्ति नो बृहस्पतिर्ददातु!’

अमरता के रास्ते

मुझे क्षमा करें महत्जन
मेरी क्षुद्रताओं के लिए
मैं झुकता हूँ घुटनों के बल
मामूली प्रार्थनाओं में
और माँगता हूँ विराट ईश्वर से
केवल मामूलीपन
कि मैं न थकूँ आदमी के होने से
बचे रहें आदमी में:
भय और शर्म
घृणा और प्रेम
उसका सर्द-गर्म खून
उसकी बेसब्री इरादे उसके
उसकी देह में ढला इस्पात

अमरता के तमाम रास्ते
जाते हैं उधर से

रविवार, 15 नवंबर 2009

स्मृति और स्वप्न

पिता अपनी तमाम असफलताओं को 
बदल लेना चाहते हैं सफलताओं में
अपने पुत्र में

पिता के स्वप्न को ढोता पुत्र
पिता की स्मृति भी तो है
नहीं जानते पिता पितृत्व से ग्रस्त

पिता के स्वप्न को ढोता पुत्र
एक दिन लौट आता है
पिता की स्मृति में पिता बन कर

पिता बन कर लौटा पुत्र अचानक जीने लगेगा
एक दिन अपने पुत्र की स्मृति में
पिता का स्वप्न बन कर

होते हुए होना

जड़ें ठीक से बताती हैं 
होने के बारे में

मूल की महिमा को
छिपाये रहते हैं वृक्ष

दिखने से दूर
होते हुए होना

शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

दरअसल

दरअसल उजाला ओढ़ने को
हम इस कदर उतावले हैं
कि धूप के इरादों की नेकनीयती पर
शुब्हा कर ही नहीं पाते
हर बार चमाचम सूरज की चाह में
हम ग़लत मौसम चुनते हैं
और मार खाते हैं

वे हमारी कमजोरी से वाकिफ़ हैं
और चौगिर्द फैले अँधेरे के खिलाफ़
हमें हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं

उन्हें मालूम है
घुप्प अँधेरी रात में
मशाल दिखा कर ही
पतंगे को बरगलाया जा सकता है
मर मिटने को
दीवाना बनाया जा सकता है